Sunday, July 30, 2017

बख्शीस




अनुपमा (सोनाली से)-:  ''सोनाली ! इधर आ । मै तुझे खिलौना दिखाती हूँ ।''

सोनाली नीचे पोछा करती हुयी, एक पल के लिए पीछे पलटी, लेकिन पूर्ववत अपने काम में लग गयी, जैसे उसने कुछ सुना ही ना हो । शायद उसे पिछली घटना का स्मरण हो आया था, जब बड़ी मालकिन ने सिर्फ इसीलिए उसे पिट दिया था की उसके पास एक चॉकलेट का कवर था, जो गलती से अनुपमा का था । यह तो बाद में अनुपमा ने आकर बताया की उसने ही यह कवर सोनाली को चॉकलेट खाने के बाद दिया था ।

इस घटना के बाद सोनाली की माँ ने सोनाली को हिदायत देते हुए कहा -: ''अब उसके पास भी मत जाना, नहीं तो फिर मार पड़ेगी और फिर प्यार जताते हुए कहा देखो तो कैसे मारा है इस फूल सी बच्ची को, आने दो मालिक को, देखना मै खुद मालकिन की शिकायत करूंगी ।'' 

लेकिन सोनाली के माँ तो यह जानती थी की यह सिर्फ दिखावा है असल में तो वह अपना मुह भी नहीं खोल सकती है, दरअसल उसका पूरा परिवार, और ना सिर्फ उस अकेले का परिवार बल्कि सारा गाँव ही बड़े मालिक का बंधुवा है। उस गावँ के निवासी और उनके पूर्वज दसको से ठाकुर की गुलामी करते आ रहे है ।

लेकिन अनुपमा फिर से (सोनाली से) -: ''सोनाली आ । ये देख मेरी नयी गुड़िया जो  मेरे पापा ने मेरे इस जन्मदिन पर दिया था ।''

शायद यह किसी छोटी बच्ची के लिए एक अग्नी परीक्षा से काम नहीं था की उसके सामने उसका  पसंदीदा खिलौना रखा हो और वो उसे अपने हाथो से छू  भी ना सके, और काफी देर के जद्दोजहद के बाद वो खुद को रोक ना सकी। और डरते - डरते कदमो से अनुपमा के पास गयी ।

और जब खिलौने को देखा तो एकदम से देखती ही रह गयी, इससे पहले उसने कभी ऐसा खिलौना देखा ही नहीं था, यह तो उसके लिए एक स्वप्न के जैसा ही था । कुछ देर तक एकटक देखने के बाद, उसका मन हुआ की वह एक बार उसे अपने हांथो से छूकर देखे, और उसने अपने हाँथ बढ़ाने चाहे लेकिन उसके हाँथ तो जैसे बेजान थे और वह चाहकर भी अपने हाथ को हिला तक ना सकी । अब अनुपमा ने एक-एक करके उसे अपने सारे खिलौने दिखाए, जैसे- अपनी पुरानी गुङिया और गुड्डा, हाथी-घोङे और भी ना जाने क्या-क्या ।

सोनाली एकटक ललचायी नजरों से बस खिलौनों को देखे जा रही थी, और वह खिलौनों को देखने मे इतनी मगन हो गया कि उसे आसपास का कुछ ध्यान ना रहा, लेकिन कुछ छण बाद, जब वह वापस चेतना मे आई तो उसने देखा माँ सजल नेत्रो से उसे ही देख रही थी, और जैसे ही दोनों कि नजरें आपस मे मिलीं, तो माँ हड़बडाते हुये बोली- "चल छुटकी!  जल्दी से काम खतम कर, मालकिन आती ही होंगी। अगर समय पर काम खत्म ना किया तो मालकिन गुस्सा होंगी।''

फिर सोनाली अनिच्छा से उठी और जल्दी-जल्दी अपना काम समेटने लगी।

इस तरह धीरे-धीरे लगभग छः महीने बीत गये, सोनाली हर सुबह अपनी माँ के साथ आती और शाम को घर
चली जाती।अनुपमा का दाखिला शहर के किसी बड़े स्कूल मे हो गया था, और वह होस्टल मे रहकर पढ़ाई पुरी
करने लगी। छुट्टियों मे कभी-कभी घर आती थी, इसी वजह से सोनाली उदास रहने लगी, पता नही कहां खोई
रहती थी, उसका काम मे भी मन नही लगता था और इसी वजह से उसे आये दिन मालकिन से डाँट सुननी
पड़ती थी।

एक दिन सोनाली काम खत्म कर अपनी माँ के साथ घर जाने के लिए निकली ही थी कि उसे किसी ने पुकारा।सोनाली को खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था कि बड़ी मालकिन ने आज उसे उसके नाम से पुकारा, वह यह सोच ही रही थी कि दूसरी आवाज गुंजी- "सोनाली।"

सोनाली - "ज्ज्जज....जी बड़ी मालकिन।" और बिना देर कि ये सोनाली उनके पास पहुँची।
तो मालकिन ने कर्कश आवाज मे पुछा- "कहां रह गई थी तू, यह अनु के खिलौने हैं, अब अनु तो यहाँ है नही, इसे खेलने के लिए इसीलिए इन्हें तुम ले ले।''

इतने सारे खिलौने देखकर तो वह फूली नही समायी। जिस बड़ी मालकिन को वह स्कूल की मास्टरनी से भी
ज्यादा कठोर समझती थी, वह तो मन से बहुत निर्मल है। तभी बड़ी मालकिन ने खिलौनों की ढेर से एक
गुड़िया निकाली। इस गुड़िया का एक हाथ टुट चुका था, कपड़े फट चुके थे, और जो शेष बचे भी थे, एकदम गन्दे
हो चुके थे। ध्यान से देखा तो पता चला कि यह तो वही गुड़िया है, जिसे अनुपमा के पिताजी ने उसे उसके
जन्मदिन पर दिया था और सोनाली का मन तो उसे सिर्फ एक बार छुट्टियों लेने को लालायित था। किन्तु आज
क्या हुआ उसका गुड़िया के प्रति जो दिवानगी थी, जो जुनून था वह पुरी तरह से खत्म हो चुका था।उसने गुड़िया
लेने मे अनिच्छा प्रकट कि, किन्तु तभी उसकी माँ ने कहा - "ले ले छुटकी! बड़ी मालकिन खुश होकर दे रही है।"

लेकिन सोनाली ने प्रतिक्रिया नही की, जैसे उसने कुछ सुना ही ना हो। फिर बड़ी मालकिन ने गुड़िया उसके हाथ
पर मार,भुनभुनाते हमसे एक तरफ चल दी। सोनाली फिर भी वहीं खड़ी रही।

फिर माँ ने उसके सिर पर अपना हाथ रखा और प्यार से बोली- "ऐसे क्या देख रही है? बड़ी मालकिन किसी को
कभी कुछ नहीं देती हैं। पहली बार तुझे खुश होकर बख्सीस दिया है, तू सचमुच बहुत भाग्यशाली है।"

पर सोनाली के मन मे कुछ और ही चल रहा था कि यह कैसी बख्सीस है, जिसे पाकर वह खुश नहीं है, देने वाला
भी खुश नही है, लेकिन उसकी माँ खुशी से फूली नहीं समा रही हैं। और सोनाली मन ही मन फुसफुसाई - '' यह कैसी बख्शीस|''

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